बरसती बरखा सुहानी!

बरसती बरखा सुहानी!

साँझ में घिरती घटा की
अलक उड़ स्वच्छंद खेले।
लुक-छिपा है सूर्य उनमें,
स्वर्ण कण नभ में बिखेरे।

झूम कर लटके घटा भी
सूर्य के गल-बाँह डाले,
जिद पकड़ कर पूछती है,
दिन कटा कैसा बता रे।

बस जरा सी देर में ही
खिलखिला कर उड़ चली यूँ,
कान में जैसे सुनी हो
गुदगुदाती हुई कहानी।
बरसती बरखा सुहानी! ॥१॥

आतुर हुई है धरा भी,
है खड़ी आँचल पसारे।
लाड़ली अब अंक लग कर,
गोद में मेरी समा रे।

हर्ष धरती का मुखर है,
हास है सब पर लुटाया।
भर रही है बिंदु मोती,
थाल सा आँगन सजाया।

हृदय धरा पर बहा कर,
भींचती यूँ बाँध कस कर,
अंक में सच ही समाहित,
सिक्त मिट्टी सोख पानी।
बरसती बरखा सुहानी! ॥२॥

मेघ से अम्बर पटा था,
अब जरा सा खुल गया है।
सूर्य भी अब विदा होकर,
अस्ताचल में छिप गया है।

निकल आये कुछ सितारे,
व्योम में हैं झिलमिलाते।
हैं सुझाते रात को वे
ओढ़नी उनसे बना ले।

रात का परिहास देखो
कह रही है भीगती वह,
ओढ़ ली चुनरी अगर तो
धूप बिन होगी सुखानी।
बरसती बरखा सुहानी! ॥३॥

प्रेम में एक युगल डूबा
प्रणय मद में बह रहा है।
समय की पद-चाप मंथर,
मुग्ध हो क्षण थम गया है।

बोलते हैं मुख मधुर कुछ,
नयन भाषा खूब बूझें।
जो कहा वह है अकिंचन,
अहम यह कि हृदय रीझें।

प्रकृति भी सब समझ कर
लिख रही स्मृति पटल पर।
शीत में ऊष्मा बनेगी
मिलन की यह मधु निशानी।
बरसती बरखा सुहानी! ॥४॥

९ अक्टूबर २०१६
बंगलौर