कुंठ सर्ग - भाग २ - रात बीती, पर न बीती

[विराट की महारानी सुदेष्णा त्रिगर्त-युद्ध से समाचार के लिए व्याकुल, विचार-मग्न हैं]

रात बीती, पर न बीती।

गवाक्षखिड़की, झरोखा में सुदेष्णा
देखती है आवरण से,
भोर हो आई, न आया
कोई भी सन्देश रण से।

समर की दुष्कल्पनाएँ
कर रही हैं व्यग्र मति को।
जय हुई महाराज की या
पा गए हैं वीरगति को।

हे भवानी! मत्स्य सेना
हाय! जीती या न जीती? ॥१॥

हम बने थे त्रासअनिष्ट, क्षति, हानि आदि का भय, कष्ट जिसके
आज रिपुशत्रु, दुश्मन वह द्वार आया।
घात कीचक ने किया था,
सबल अब प्रतिकार आया।

कह रही हो नियति जैसे —
भ्रात की पाली कपोतीकबूतरी!
देख अब कालीचंडी देवी का एक रूप खड्गतलवार से
मुंड की माला पिरोती,

क्रुद्ध नर-शोणितखून बहाती,
थामथामना: हाथ में पकड़ना खप्परकपाल/खोपड़ी का पात्र जो काली की मूर्ति के हाथ में रहता है रक्त पीती। ॥२॥

भ्रात कीचक के सहारे
था निरापदआपदा या संकट से पूर्ण रूप से सुरक्षित राज अब तक।
शक्ति के बिन राज्य कोई
है रहा स्वाधीन कब तक?

युद्ध का महाराज को भी
ना रहा अभ्यास अब तो।
पाप का घट भर रहा था,
फूटता, लो आज भुगतो।

पुण्य यदि एकत्र तो वर
माँगती बन आगृहीतीदेशज रूप: आग्राहक; जमा किए हुए धन में से कुछ निकालने वाला। ॥३॥

पर तनिक थम सोच यह भी
यदि विजित होता सुशर्मा,
ध्वस्त कर देता नगर को,
दण्ड देता, धृष्ट-कर्मा।

धर्म से यदि न बंधा हो,
सैन्य ही अवरोध हो जब,
रोध हटने पर निरंकुश
क्रूर में करुणा बसी कब?

तो अभी भी युद्ध शायद
चल रहा है; व्यर्थ भीतीभीति, डर। ॥४॥

आस का लघु क्षीण तिनका
डूबते का है सहारा।
सांत्वना देकर हृदय को,
“सेविका!” उसने पुकारा,

“फूल, फल, नैवेद्यदेवता या मूर्ति को भेंट की या चढ़ाई हुई खाद्य वस्तु, भोग ले आ”
यह चली निर्देश देकर।
स्नानकर रानी पधारी।
भक्तिमय, घृत-दीप लेकर,

देव दुख में यादकर के
गा रही है भजन-गीतीगीत। ॥५॥

अर्चना कर, निकल बाहर
आ गयी वह प्रांगणआँगन में।
उत्तर वहाँ हास-रत था
दासियों से विपदविपत्ति, आफत, संकट, विपदा क्षण में।

वीर सुत की चाह उत्कटउग्र, तीव्र ,
हैं परंतु कुमार ऐसे।
भोग-मय विलसितक्रीड़ा में मग्न, विनोदी धरा में
सच उगेगा शूरवीर, बहादुर, योद्धा, सूरमा कैसे?

श्रम-अमियअमृत से सींचती तो
विष भला क्यों आज पीती? ॥६॥

चारिकासेविका, दासी आयी तभी औ’
साथ में सन्देशवाहक,
“हे कुँवर! उत्तर दिशा से
कौरवों का वार दाहक।

“कर्ण, दुर्योधन, दुशासन,
भीष्म, द्रोण, अपार सेना,
लाँघ सीमा गौ चुराईं,
ग्वाल से रोके रुके ना।

“आप ही कुछ कीजिए अब
सुन हमारी आप-बीती।” ॥७॥

सकपका उत्तर निमिषपलक झपकने भर का समय को
शीत-विद्युत रीढ़ में सह,
मूढ़-किंकर्तव्यकिंकर्तव्यविमूढ़: किम् कर्त्तव्य विमढ, क्या करना है समझ में न आना शावककिसी पशु या पक्षी का बच्चा
यत्न से संयतसंयम में, सीमा में, मर्यादित हुआ वह।

सुन सुदेष्णा भी रुआँसी,
हाय! रोका क्यों तनयपुत्र, बेटा को?
भेज देती कल समरयुद्ध में,
सैन्य संग रक्षित तनिक तो।

यदि गया रण में अकेले
नियतनिश्चित समझो कोख रीती। ॥८॥