देख ले ऊषा तिमिर को बेध कर है मुस्कराती

देख ले ऊषा तिमिर को बेध कर है मुस्कराती।

रात भर पग-भार ढोता
मंद-मंथर बढ़ रहा था।
लक्ष्य क्या, किस ओर चलना,
सोच मन में कुढ़ रहा था।

भटकता इस ओर से उस
छोर तक था ढूँढता नयमार्ग-दर्शक, नीति, जीवन जीने का ढंग,
तम सघन में नयन मुंद-खुल
तौलते थे जय-पराजय।

आँख की लाली छिटक अब प्रात के नभ को सजाती।
देख ले ऊषा तिमिर को बेध कर है मुस्कराती॥

२६ मार्च २०१७
बंगलौर