जा रहा हूँ मैं नहाने!

आज मैं अपनी ही खिंचाई करने में मूड में हूँ :-) अगर मुझसे ठंड में ठंडे ठंडे पानी से नहाने पर कविता लिखने को कहा जाए, तो मैं कुछ यूँ लिखूँगा...

जा रहा हूँ मैं नहाने!

प्रात की लाली अभी तक
मुँह छिपा सोई हुई है।
नव दिवस के सत्कार को
नहीं कोई तत्पर कहीं है।

और मैं हूँ शीत की इस
ब्रह्म वेला में समर्पित,
दृढ हृदय प्रस्तुत हुआ
निष्कंप जल में थरथराने! ॥१॥

भीष्म करतब देख कर यह
गगन का मन उमड़ आया,
तुहिन आखों में समेटे
प्रयत्न से वह मुस्कुराया,

कह रहा प्रशस्ति से भर
कि उसमें भी साहस नहीं,
इस घड़ी में वह जो होता
ढूंढ़ लेता सौ बहाने! ॥२॥

पुष्प मेरी वन्दना को
लघु कलश सर पर उठाये,
अभिषेक को आतुर हुए
श्रद्धा मेरी मन में सजाये।

मैंने कहा कि खूब है यह
कृत्य भीषण पूजने को
कर रहे तुम भी वही हो
मैं जिसे निकला ढ़हाने! ॥३॥

चीरती निस्तब्धता को
एक चिड़िया चहचहाई,
हाय कैसी नियति निर्मम
तनिक भी न दया आई।

सांत्वना मैंने उसे दी,
सजग साक्षी आज बन तू,
देख मुझको, कठिन क्षण भी
अमर निर्भय गीत गाने! ॥४॥

जा रहा हूँ मैं नहाने!

८ नवम्बर २०१६
बंगलौर