कह-मुकरियाँ

मुकरियाँ (मुकरी) या कह-मुकरियाँ (कह-मुकरी) एक काव्य संरचना है जिसे अमीर खुसरो ने विकसित किया था और भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी खूब अच्छी लिखीं। यह दो सखियों के बीच वार्तालाप है, जिसमें नामानुसार कुछ कह कर उससे मुकर जाना होता है। इसकी पहली तीन पंक्तियों में एक सखी साजन की बात करती जान पड़ती है। चौथी पंक्ति के दो भाग होते है: प्रथम भाग में दूसरी सखी पूछती है कि क्या वह अपने साजन की बात कर रही है, और दूसरे भाग में पहली सखी चतुराई से मुकर जाती है, और एक ऐसी चीज बताती है जिसपर वही चित्रण पूरी तरह से सटीक बैठता है।

यह मेरा कह-मुकरियाँ लिखने का पहला प्रयास है।

लंबी बाहें पकड़ के झूमूँ,
गोद में बैठी अम्बर चूंमूँ,
संग में उसके समय भी भूला।
क्यों सखि साजन, नहिं सखि झूला॥

लिपट के तन से चिपक ही जावे,
अंग-अंग नटखट सहलावे,
पर उसे छोड़ न पाऊं बावरी।
क्यों सखि साजन, नहिं सखि चुनरी॥

नयन के आगे रहे वो खड़ा,
कान उमेठे हाय नकचढ़ा,
मैं अभागिन उसके वश मा।
क्यों सखि साजन, नहिं सखि चश्मा॥

१० सितंबर २०१६
बंगलौर