क्यों नया मैं गीत गाऊँ?

नव रागनी छेड़ूँ भला क्यों, क्यों नवल कोई स्वर सजाऊँ?
क्यों नया मैं गीत गाऊँ?

जब नयी कोपल खिली तो
ओस के मोती सजे थे।
सर-पलक पर सजा सुरभि,
पवन-झोंके मद भरे थे।
मधुप से गुणगान सुनकर
खूब इतराई थी रूप पर।
पर जराबुढ़ापा, senescence, agedness को क्या ज़राथोड़ा, तनिक, a little भी
दया आई थी कुसुम पर?
सूख गया मकरंद सारा,
अंग-अंग कुम्हला गया।
जिस सृष्टि ने उसको रचा,
भू पर वही बिखरा गया।
मिट गयी हर निशानी,
सत्य यह कैसे भुलाऊँ?
क्यों नया मैं गीत गाऊँ?

सूर्य की रश्मियाँ सुनहरी
पड़ीं जब जल की सतह पर,
बंध स्पर्श की ऊष्मा से,
उड़ी बूंदें भाप बन कर,
कि फिरेंगे स्वच्छंद नभ में
बादलों का रूप धर कर।
इस गमन से, नव रूप में
रवि-शशि के हुई निकटतर।
फिर जिस पवन के संग उड़ी,
प्रभंजन बन वेग से चला।
वही ऊर्जा तड़ित बन अब
कड़की, चमकी, उग्र बला।
बूंदे बरसीं, गिरी महीपृथ्वी, धरती, earth पर;
वापस आकर फिर पछताऊँ?
क्यों नया मैं गीत गाऊँ?

७ नवंबर २०१५
बंगलौर