परदेश में होली

न रंग, न गुलाल, न गुझिया, न उमंग,
न बड़े, न छोटे, न साथी कोई संग।
कैसी ये होली जब होलिका न जलायी,
न रस्में निभायीं, न लड़ी लड़ाई।
प्यार की फुहार से न भीगा कोई अंग।
न रंग, न गुलाल ...

सोचा न था कि कभी होगा भी ऐसा,
सपनों का यहाँ तक करूँगा मैं पीछा!
मेरी ये चोटी पे चढने की चाहत,
देगी मुझे पीड़ा, करेगी यूं आहत!
सुख हैं, पर खोयी खुशियों की तरंग।
न रंग, न गुलाल ...

फागुन की डाली पे वो मस्ती के झूले,
पेंगें वो ऊंची कि अंबर को छू लें।
गाँव की गलियाँ, महक सोंधी-सोंधी,
सपनों की लड़ियाँ जहाँ मैने गूंथी।
जाना न सपनों का ऐसा भी रंग।
न रंग, न गुलाल ...

चुपके से उसके गालों को रंगना,
बदले में गुस्से से उसका बिफरना,
फिर मीठी सी स्मित, नजरें वो चंचल,
कैसे मैं रुकूँ मन की ये हलचल?
परदेश में यादों की उड़ती पतंग।
न रंग, न गुलाल ...

२१ मार्च १९९८
Lowell, MA, USA